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गोद में 9 महीने की बच्ची, सामने उफनती नदी; फिर भी बच्चों को पढ़ाने स्कूल पहुंचती है ये टीचर

 Written By: Vineet Kumar Singh
 Published : Sep 19, 2026 07:58 am IST,  Updated : Sep 19, 2026 07:58 am IST

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर में 2 शिक्षिकाएं बारिश के दौरान 3 किलोमीटर पहाड़ी रास्ता पैदल तय कर उफनती नदी पार करके स्कूल पहुंचती हैं। कर्मिला टोप्पो अपनी 9 महीने की बच्ची को गोद में लेकर भी बच्चों को पढ़ाने जाती हैं।

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नदी पार करती हुई दोनों टीचर्स। Image Source : ANI

Highlights

  • 9 महीने की बच्ची को गोद में लेकर उफनती नदी पार करती हैं शिक्षिका कर्मिला टोप्पो।
  • स्कूटर छोड़कर 3 किलोमीटर पहाड़ी रास्ता पैदल तय करती हैं दोनों महिला शिक्षक।
  • बलरामपुर कलेक्टर ने शिक्षिका के समर्पण को बताया पूरे जिले के लिए गर्व की बात।

बलरामपुर: छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में बारिश के मौसम में 2 महिला टीचर हर दिन ऐसी मुश्किल यात्रा करती हैं, जिसे देखकर किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाएं। स्कूल तक पहुंचने के लिए उन्हें अपनी स्कूटी छोड़कर करीब 3 किलोमीटर पहाड़ी और पथरीले रास्ते पर पैदल चलना पड़ता है और फिर उफनती नदी को पार करना पड़ता है। इन दोनों शिक्षकों में से एक कर्मिला टोप्पो अपनी 9 महीने की बच्ची को गोद में लेकर नदी पार करती हैं। पानी कभी कमर तक तो कभी उसके ऊपर भी पहुंच जाता है, इसके बावजूद वह बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल पहुंचने की कोशिश करती हैं।

बारिश में कट जाता है गांव का संपर्क

यह मामला बलरामपुर के वाड्रफनगर ब्लॉक के धौरपुर गांव का है। धौरपुर बस्ती मोरन और इरिया नदियों के संगम के आगे स्थित है। बारिश के मौसम में नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद यह इलाका बाकी दुनिया से लगभग कट जाता है। इस दौरान गांव तक पहुंचने का रास्ता बेहद मुश्किल हो जाता है। गाड़ियां वहां तक नहीं पहुंच सकतीं। ऐसे में शिक्षकों को पैदल ही पहाड़ी रास्ता पार करके नदी से गुजरना पड़ता है। संध्या हलदार और कर्मिला टोप्पो इसी स्कूल में बच्चों को पढ़ाती हैं और हर साल मानसून के दौरान इसी चुनौती का सामना करती हैं।

Chhattisgarh Teacher Story, Balrampur Teacher News
Image Source : ANIअपनी बच्ची के साथ कर्मिला टोप्पो।

स्कूटी छोड़कर 3 किलोमीटर पैदल सफर

संध्या हलदार ने बताया कि दोनों शिक्षक अपनी स्कूटी मरना नाम की जगह पर खड़ी कर देती हैं, क्योंकि इसके आगे वाहन नहीं जा सकते। उन्होंने कहा,

'हम अपनी स्कूटर मरना में खड़ी करते हैं। इसके आगे पूरा रास्ता पहाड़ी है। हम 3 किलोमीटर पैदल चलते हैं, नदी पार करते हैं और फिर स्कूल पहुंचते हैं। जिन दिनों पानी कम होता है, हम नदी पार कर लेते हैं। लेकिन जब पानी बहुत ज्यादा बढ़ जाता है तो हमें नदी से ही वापस लौटना पड़ता है।'

‘बच्चे हमें देखकर बहुत खुश हो जाते हैं’

मुश्किल रास्ते और जान जोखिम में डालकर नदी पार करने के बावजूद शिक्षिका कहती हैं कि बच्चों की खुशी उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देती है। संध्या हलदार ने कहा,

'बच्चे बहुत छोटे हैं। हमें उनकी बहुत चिंता रहती है। हमें बुरा लगता है कि हम उन तक नहीं पहुंच पाते या उन्हें शिक्षा नहीं दे पाते। जब बच्चे हमें देखते हैं तो वे बहुत खुश हो जाते हैं।'

यही वजह है कि बारिश में रास्ता कितना भी मुश्किल हो, दोनों शिक्षिकाएं स्कूल पहुंचने की कोशिश करती हैं।

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Image Source : ANIसंध्या हलदार।

2014 से स्कूल में तैनात हैं कर्मिला टोप्पो

कर्मिला टोप्पो 2014 से इस स्कूल में तैनात हैं। उन्होंने बताया कि हर साल बारिश के मौसम में उन्हें इसी तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। 9 महीने की बच्ची को गोद में लेकर नदी पार करते हुए टोप्पो ने कहा,

'हर साल बारिश के मौसम में ऐसा ही होता है। हमें इस रास्ते से जाने के लिए मना किया जाता है। कहा जाता है कि अगर पानी का स्तर ज्यादा हो तो वहां नहीं जाना चाहिए।'

इसके बावजूद वह बच्चों को पढ़ाने के लिए इस कठिन रास्ते से स्कूल पहुंचने की कोशिश करती हैं।

खबरों से कलेक्टर तक पहुंची शिक्षिका की कहानी

इन दोनों शिक्षकों की मेहनत और समर्पण की चर्चा होने लगी तो इसकी जानकारी बलरामपुर कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी तक भी पहुंची। खास बात यह रही कि उन्हें इसकी जानकारी किसी आधिकारिक माध्यम से नहीं, बल्कि समाचार रिपोर्ट के जरिए मिली। कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी ने कहा,

'मुझे ANI के जरिए जानकारी मिली कि हमारे जिले की एक शिक्षिका अपने छोटे बच्चे को साथ लेकर नदी पार करती हैं और बारिश के मौसम में भी 3 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचती हैं।'

कलेक्टर ने की शिक्षिका के समर्पण की तारीफ

कलेक्टर ने कर्मिला टोप्पो की मेहनत और जिम्मेदारी की सराहना की। उन्होंने कहा कि शिक्षिका ने अपनी ईमानदारी और कड़ी मेहनत से जिले के दूसरे शिक्षकों के सामने एक सराहनीय उदाहरण पेश किया है। उन्होंने कहा,

'उनकी अपार ईमानदारी और मेहनत ने जिले के दूसरे शिक्षकों के लिए एक बेहद प्रशंसनीय उदाहरण पेश किया है। मैं उन शिक्षकों का बहुत सम्मान करता हूं जो अपने कर्तव्य के प्रति इतने समर्पित हैं। ऐसे शिक्षक बहुत कम होते हैं। ऐसी शिक्षिका को सम्मानित करना पूरे जिले के लिए गर्व और सम्मान की बात है।'

बारिश के मौसम में धौरपुर तक पहुंचना जहां आम लोगों के लिए बड़ी चुनौती है, वहीं संध्या हलदार और कर्मिला टोप्पो के लिए यह बच्चों की पढ़ाई से जुड़ी रोज की जिम्मेदारी बन गई है। हाल ही में नक्सल प्रभावित बीजापुर से भी कुछ ऐसी ही खबर सामने आई थी जहां 53 बच्चों को शिक्षक मुफ्त में कोचिंग पढ़ा रहे हैं(ANI से इनपुट्स के साथ)

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